#52 Shayari

बेइन्तेहां ही हो, गर खता ऐसी हो, मोहब्बत है ही इतनी खुबसूरत.

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है तो ये रोग ही

है ये भी अच्छा मर्ज़ हमें, उनकी चाह के रुओं से सिमटे, उँगलियों में जैसे पड़ी हो सिलवटें, खीच लाती है उसकी प्यास हमें. हां है तो ये रोग ही, हर पल थोड़ा ज्यादा ही लगता है, कुछ देर और ठहर जाए, उसके रंग में मन रमता है. कुछ कहदो और थोड़ा सहला भी दो, …

कुछ ऐसा है हाल

है ये कैसी हार मोहब्बत, खुद को हार बैठा, फिर भी ज़हन में जीत महसूस होती है. है ये कैसी नाकामी प्यार, बिछड़के भी उसकी कमी नहीं लगती है, यादों में वो आज भी नयी है. है ये कैसी तिश्नगी इश्क, उम्र यादों में ढलती जा रही है, धड़कने यूं ही बढती जा रही हैं. …

इश्क

है रब की नेमत आज भी मुझपे, कुछ बीते लम्हों की मुस्कान आज भी है, निगाहें ढूंड रही हैं वो सारे रिश्ते, जिनसे महक तेरी आती है. कमियां तो हैं; तू पूरी करदे, वो दो रिश्ते मुझे एक आखरी दफा देदे, दिल टूट जाए वो मोहब्बत का नाटक करदे, नमूना बनादे, बेवफाई करके. तुझसे गिले, …

#17 Shayari

शिद्दत की कमी कहां हममें, पत्थर दिल से मोहब्बत जो कर गुज़रे, खुद से बेरुखी का सबब, शायद इश्क करके बयां होगा.