छोटी माँ

अगर उस दिन आप, वो दस पन्ने की किताब मुझे देतीं, कि मैं एक वाक्य में आपके लिए कुछ कह सकूं, तो मैं वो किताब रख लेती, फिर भी शायद शब्दों से भेद-भाव हो जाता, कयोंकि प्यार लिखके समझाना नहीं आता, कहीं विराम नहीं लगाती, और किताब एक वाक्य बन जाती. वो तुम से ही …

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है तो ये रोग ही

है ये भी अच्छा मर्ज़ हमें, उनकी चाह के रुओं से सिमटे, उँगलियों में जैसे पड़ी हो सिलवटें, खीच लाती है उसकी प्यास हमें. हां है तो ये रोग ही, हर पल थोड़ा ज्यादा ही लगता है, कुछ देर और ठहर जाए, उसके रंग में मन रमता है. कुछ कहदो और थोड़ा सहला भी दो, …

मेरी दादी

मम्मी दादी कहूं या मम्मा, सब तेरे ही नाम हैं, आसमां के किसी घने बदल के पीछे से निहारती हो, नहीं तो सपनों में आकर अपनी फ़रमाइशें जताती हो, अच्छा ही है की अपने होने का एहसास हर बार दिलाती हो. हर ग्यारह तारीख को गुरूद्वारे की संगत तुझे दुआओं में याद करती होगी, तू …

कुछ ऐसा है हाल

है ये कैसी हार मोहब्बत, खुद को हार बैठा, फिर भी ज़हन में जीत महसूस होती है. है ये कैसी नाकामी प्यार, बिछड़के भी उसकी कमी नहीं लगती है, यादों में वो आज भी नयी है. है ये कैसी तिश्नगी इश्क, उम्र यादों में ढलती जा रही है, धड़कने यूं ही बढती जा रही हैं. …

इश्क

है रब की नेमत आज भी मुझपे, कुछ बीते लम्हों की मुस्कान आज भी है, निगाहें ढूंड रही हैं वो सारे रिश्ते, जिनसे महक तेरी आती है. कमियां तो हैं; तू पूरी करदे, वो दो रिश्ते मुझे एक आखरी दफा देदे, दिल टूट जाए वो मोहब्बत का नाटक करदे, नमूना बनादे, बेवफाई करके. तुझसे गिले, …

#27 Shayari

वक़्त की पाबंदियां कहां, दो-चार बातें और कह जाओ, लफ़्ज़ों में तुम बयां करना, तहज़ीब हम रखेंगे, तुम्हें बताने को कहानियां मिल जायेंगी, हम उसे गुफ्तगू कह देंगे.

क्या था?

क्या था, चुभा तो सही, जुदा तो था, टूटा भी वही, अपना ही था, कोई गैर नहीं, धोका ही था, या था प्यार कहीं, वो अश्कों से बहा, मायने लफ़्ज़ों के नहीं, थम गयी वो घड़ी, मुस्कुराहट रुकी ही नहीं, कलम शिकवे लिखती है, स्याही लाल बिखरती नहीं, उब गए अब तो, वो नाम याद …

When a father misses his daughter

दीवारें अब भी मुस्कुरा रही हैं, समा गया है खिलखिलाना उसका, वीरानियां तो दिल के कोने-कोने में हैं , गुरैया की तरह, उसका चेहचहाना भी कम ही सुनाई देता है.

कुछ इस तरह मेरी पलकें…

कुछ इस तरह मेरी पलकें उनसे मिल आतीं, शब्दों से नहीं, अश्कों से वो नज़्म कह जाती, मिल जाता कुछ खोया सा, फिर जुड़ जाता कुछ टूटा सा, यादों में ढलती कई और शामें, खाली दिल थोडा भर जाता, मूह फेर लेते तनहाइयों से एक और बार, फ़ैल जाती अंगड़ाईयों सी चेहरे पे मुस्कान, कुछ …