कुछ अजीब है

एक अजीब सा सन्नाटा है. जल्दी-जल्दी में वो अपनी हर बात कह देती है, मगर, एक अजीब सी ख़ामोशी है. कानों में आज भी उसकी हंसी गूंजती है, मगर, एक अजीब सी उदासी है. सपनो को हासिल करने का जज़्बा है, मगर, एक अजीब सी थकान है. यूं तो हर महफ़िल की वो जान है, …

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Sensitive OR Insensitive

ना जाने इनके कितने पैने औज़ार हैं, जो हमारे बत्तीस सीधे तन के खड़े हैं, यहां एक अपशब्द से देखो, बत्तीस सालों के रिश्ते कैसे बिखरे पड़े हैं. हर जगह दांतों की सेंसिटिविटी की बात हो रही है, यहां इंसानियत ही नज़रंदाज़ हो रखी है. इंसानों की इनसेंसिटिविटी को कोई मर्ज़ मानता ही नहीं है, …

आज फिर

आज फिर तुम्हें याद किया है, अब शायद हर आने वाले दिन, मैं तुमसे यही कहूंगा. तुम्हारे बिना जैसे पहले रहता था, अब वैसे भी नहीं रह सकूंगा, अकेला था तो ही अच्छा था, अब यादों का सहारा है, पर दिल तो अब भी बच्चे सा कच्चा है. नज़रें हर ओर पहुच जाती हैं, पर …

कभी यूं भी तो हो

कभी यूं भी तो हो, कि मैं ना लिखूं, पर तुम पढ़ सको. कांटें चुभ उठे, जब गुलशन में पुष्प ना दिखें. दाना-पानी हर दिन मिले, फिर भी पंछी छत पर उतरे ना हो, कई दिनों की ख़ामोशी से भी, रिश्तों में मिठास की कमी न हो, जिनकी सिर्फ बेटियां हों, वो बेटे की चाह …

शब्द

शब्दों का क्या है, कुछ अधूरे हैं, कुछ पुरे हैं, कुछ लाठी के सहारे हैं, कुछ बोझ तले दबे हैं, कुछ साज़ में घुले हैं, कुछ हैं नासाज़, कुछ समेट लेते हैं, कुछ बिखेर देते हैं, कुछ किताबों में दबे हैं, कुछ भीतर-ही-भीतर जा छिपे हैं, जो वादियों में सुनाई दे वो गूंज बन जाते …

छोटी माँ

अगर उस दिन आप, वो दस पन्ने की किताब मुझे देतीं, कि मैं एक वाक्य में आपके लिए कुछ कह सकूं, तो मैं वो किताब रख लेती, फिर भी शायद शब्दों से भेद-भाव हो जाता, कयोंकि प्यार लिखके समझाना नहीं आता, कहीं विराम नहीं लगाती, और किताब एक वाक्य बन जाती. वो तुम से ही …

है तो ये रोग ही

है ये भी अच्छा मर्ज़ हमें, उनकी चाह के रुओं से सिमटे, उँगलियों में जैसे पड़ी हो सिलवटें, खीच लाती है उसकी प्यास हमें. हां है तो ये रोग ही, हर पल थोड़ा ज्यादा ही लगता है, कुछ देर और ठहर जाए, उसके रंग में मन रमता है. कुछ कहदो और थोड़ा सहला भी दो, …

मेरी दादी

मम्मी दादी कहूं या मम्मा, सब तेरे ही नाम हैं, आसमां के किसी घने बदल के पीछे से निहारती हो, नहीं तो सपनों में आकर अपनी फ़रमाइशें जताती हो, अच्छा ही है की अपने होने का एहसास हर बार दिलाती हो. हर ग्यारह तारीख को गुरूद्वारे की संगत तुझे दुआओं में याद करती होगी, तू …

कुछ ऐसा है हाल

है ये कैसी हार मोहब्बत, खुद को हार बैठा, फिर भी ज़हन में जीत महसूस होती है. है ये कैसी नाकामी प्यार, बिछड़के भी उसकी कमी नहीं लगती है, यादों में वो आज भी नयी है. है ये कैसी तिश्नगी इश्क, उम्र यादों में ढलती जा रही है, धड़कने यूं ही बढती जा रही हैं. …

इश्क

है रब की नेमत आज भी मुझपे, कुछ बीते लम्हों की मुस्कान आज भी है, निगाहें ढूंड रही हैं वो सारे रिश्ते, जिनसे महक तेरी आती है. कमियां तो हैं; तू पूरी करदे, वो दो रिश्ते मुझे एक आखरी दफा देदे, दिल टूट जाए वो मोहब्बत का नाटक करदे, नमूना बनादे, बेवफाई करके. तुझसे गिले, …