#50 Shayari

हम बेशक एक ही छत के नीचे क्यों न रहते हों, परंतु कई सारी दीवारों को लांघने के बाद, एक बार मिल पाते हैं.

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मेरी दादी

मम्मी दादी कहूं या मम्मा, सब तेरे ही नाम हैं, आसमां के किसी घने बदल के पीछे से निहारती हो, नहीं तो सपनों में आकर अपनी फ़रमाइशें जताती हो, अच्छा ही है की अपने होने का एहसास हर बार दिलाती हो. हर ग्यारह तारीख को गुरूद्वारे की संगत तुझे दुआओं में याद करती होगी, तू …