आवारा हूं…

दिखता हूं तुम जैसा, पर हुबहू तुमसे मिलता नहीं, बेशक बहुत ख़ास हूं, शायद यही तुम्हे दिखता नहीं. वो रास्ते सभी घिस गए, जहां, जहान सारा चलता है, मैं उसपे क्या अपनी छाप छोडूं, जब ये राहें वो नहीं चुनता है. फक्र है मुझे कि मैं अपनी मंजिल शायद पहचानता हूं, पागल आवारा ही सही, [...]

मैं हूं वही…

मैं कहां हूं, यहां तो नहीं, किधर हूं, वहां भी नहीं, पांव ज़मीन पर हैं, मैं आसमां पे कहीं, सींचा जा रहा हूं, या बोया गया ही नहीं, हकीकत हूं किसीकी, या ख्वाबों में कहीं, चीखता-चिल्लाता ढूंड रहे हो मुझे, या खामोश हूं कहीं, बेगानों को लगता हूं अपना, या अपनों का ही नहीं, खुली [...]

मैं कहां था?

कलम उठाता हूं, फिर रख देता हूं, स्याही से जो अलग-अलग शब्दों की रचना दिखाई देती है, मैं वो ना लिख के, कुछ और लिखना चाह रहा हूं, क्या लिख रहा हूं? मैं क्या लिखता हूं. जिस राह पे जाना चाहता हूं, उसी राह पे चल रहा हूं, बस राह चलती जा रही है, और [...]